छठा सर्ग की व्याख्या
छठा सर्ग की व्याख्या
‘रश्मिरथी’ के छठे सर्ग में युद्ध की करुण, दार्शनिक और वीरतापूर्ण तीनों धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। यह सर्ग मुख्यतः भीष्म के पतन के बाद आरम्भ होता है, जब कर्ण युद्ध में प्रवेश करने से पहले पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेने शरशय्या पर जाता है। यह प्रसंग केवल युद्ध का वर्णन नहीं करता, बल्कि कर्ण के चरित्र की गरिमा, विनम्रता और उसकी आंतरिक वेदना को भी उजागर करता है।
भीष्म और कर्ण का संबंध
भीष्म और कर्ण के बीच पहले से ही मनमुटाव था। भीष्म दुर्योधन पर कर्ण के प्रभाव से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने युद्ध से पूर्व कर्ण को ‘अर्धरथी’ कहकर उसका अपमान भी किया था। इसी कारण कर्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक भीष्म सेनापति रहेंगे, वह शस्त्र नहीं उठाएगा।
दस दिनों तक भीष्म के नेतृत्व में युद्ध चलता रहा। जब भीष्म शरशय्या पर गिर पड़े, तब कर्ण का युद्ध में प्रवेश निश्चित हुआ। युद्धभूमि में शोक की लहर छा गई। यह दृश्य केवल पराजय का नहीं, एक युग के अंत का प्रतीक था।
कर्ण का भीष्म के पास जाना
कर्ण विनम्र भाव से भीष्म के चरणों में पहुँचता है। उसके मन में न कोई घृणा है, न प्रतिशोध। वह केवल अपना कर्तव्य निभाने और आशीर्वाद लेने आया है। उसकी वाणी सरल और करुण है।
भीष्म उसे समझाते हैं कि यह युद्ध विनाशकारी है। वे कहते हैं कि इस महासमर में मानवता नष्ट हो जाएगी। विजय भी अंततः शोक ही लाएगी। वे कर्ण को युद्ध से विरत होने की सलाह देते हैं।
यहाँ कवि ने युद्ध की निरर्थकता पर गहरा विचार प्रस्तुत किया है। दिनकर संकेत करते हैं कि कोई भी युद्ध पूर्णतः धर्मयुद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि उसके आरम्भ, मध्य और अंत — तीनों में हिंसा और पाप जुड़े रहते हैं।
कर्ण का निर्णय
किन्तु कर्ण रणोन्मत्त है। उसके लिए अब पीछे हटना संभव नहीं। वह दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा निभाना चाहता है। वह विजय के बिना विश्राम नहीं चाहता।
कर्ण आशीर्वाद लेकर युद्ध में प्रवेश करता है और पाण्डव सेना में भयंकर विनाश मचा देता है। उसकी वीरता और युद्धकौशल से शत्रु सेना भयभीत हो उठती है। यहाँ कर्ण का पराक्रम अपने चरम पर दिखाई देता है।
धर्म और युद्ध का प्रश्न
इस सर्ग में कवि एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न उठाते हैं — क्या महाभारत का युद्ध धर्मयुद्ध था?
उत्तर में वे संकेत करते हैं कि जब मनुष्य विजय के लिए किसी भी साधन को अपनाने लगे, तब धर्म पीछे छूट जाता है। धर्म केवल लक्ष्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस लक्ष्य तक पहुँचने के साधनों की पवित्रता में है। युद्ध में साधन की शुद्धता नहीं रह पाती।
इस प्रकार छठा सर्ग केवल युद्धकथा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य, कर्तव्य, निष्ठा और नैतिक संघर्ष की गहन व्याख्या है। कर्ण यहाँ एक त्रासदीपूर्ण नायक के रूप में उभरता है — वीर, उदार, परंतु परिस्थितियों से बँधा हुआ।
घटोत्कच का युद्ध में प्रवेश
कर्ण के युद्ध में प्रवेश करने के बाद पाण्डव सेना संकट में पड़ जाती है। उसकी अपार शक्ति और पराक्रम के सामने पाण्डवों की व्यवस्था डगमगाने लगती है। ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण एक विशेष योजना बनाते हैं। वे जानते थे कि कर्ण के पास ‘एकघ्नी’ नामक दिव्य अस्त्र है, जिसे वह केवल एक बार चला सकता है और वह अस्त्र जिस पर भी चलेगा, उसका विनाश निश्चित है।
श्रीकृष्ण चाहते थे कि वह अस्त्र अर्जुन पर न चले, इसलिए वे भीमपुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में बुलाते हैं। घटोत्कच राक्षसी शक्तियों से युक्त था और रात्रि में उसका पराक्रम कई गुना बढ़ जाता था। उसके आते ही कौरव सेना में हाहाकार मच जाता है।
दुर्योधन की व्याकुलता
घटोत्कच की मायावी शक्ति से कौरव सेना त्रस्त हो उठती है। दुर्योधन भयभीत होकर कर्ण से विनती करता है कि अब विलम्ब न करे और एकघ्नी का प्रयोग कर घटोत्कच का वध कर दे। उसके लिए उस समय अपनी सेना को बचाना अर्जुन को मारने से भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
कर्ण समझ जाता है कि यदि वह एकघ्नी का प्रयोग करता है, तो अर्जुन के विरुद्ध उसका सबसे बड़ा अस्त्र समाप्त हो जाएगा। फिर भी मित्रता और कर्तव्य की भावना से वह अपना अमोघ अस्त्र चला देता है।
घटोत्कच वध और उसके परिणाम
एकघ्नी के प्रहार से घटोत्कच वीरगति को प्राप्त होता है। कौरव सेना में हर्ष छा जाता है, क्योंकि वे विनाश से बच जाते हैं। परन्तु पाण्डव सेना में शोक की लहर दौड़ जाती है।
किन्तु इस प्रसंग में एक अद्भुत दृश्य सामने आता है — जहाँ सभी शोकाकुल हैं, वहीं श्रीकृष्ण मुस्करा रहे हैं। उनकी यह मुस्कान रहस्यमयी है। वे जानते हैं कि घटोत्कच की मृत्यु से अर्जुन का जीवन बच गया है, क्योंकि अब कर्ण के पास वह अमोघ अस्त्र नहीं रहा।
कर्ण की आंतरिक पीड़ा
यद्यपि कौरव पक्ष में विजयोल्लास है, परन्तु कर्ण के मन में गहरी पीड़ा है। वह जानता है कि उसने अपना सबसे बड़ा अस्त्र खो दिया है। बाहरी जय-घोष के बीच उसका हृदय कहीं मौन और उदास है।
कवि ने यहाँ कर्ण की मन:स्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। वह युद्ध जीतकर भी भीतर से हार चुका है। उसकी विजय अधूरी है, क्योंकि उसने अपने भविष्य की संभावना खो दी है।
सर्ग का संदेश
छठा सर्ग हमें यह सिखाता है कि युद्ध में कोई भी पूर्ण विजेता नहीं होता। एक पक्ष की हानि दूसरे पक्ष की जीत बन जाती है। कर्ण की वीरता, निष्ठा और त्याग उसे महान बनाते हैं, परन्तु उसकी नियति उसे निरंतर पीड़ा देती है।
इस सर्ग में दिनकर ने कर्ण को केवल योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और त्रासदीपूर्ण नायक के रूप में प्रस्तुत किया है। यह सर्ग वीर रस के साथ-साथ करुण और शान्त रस की भी सशक्त अभिव्यक्ति करता है।